Iran-US Tensions: परमाणु समझौते की आड़ में ईरान के साथ कहीं खेला ना कर दे अमेरिका, डोनाल्ड ट्रंप ने दी खुली धमकी
अमेरिका (USA) और ईरान (Iran) के बीच संबंध इस समय बहुत तनावपूर्ण (tense) हैं। ईरान में आर्थिक संकट (economic crisis) और हालिया प्रदर्शनों (protests) के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति (President) डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) लगातार ईरानी सर्वोच्च नेता (Supreme Leader) अली खामेनेई (Ali Khamenei) पर दबाव (pressure) डाल रहे हैं। ट्रंप लंबे समय से ईरान के साथ नए परमाणु समझौते (nuclear deal) की बात कर रहे हैं। हाल ही में उन्होंने कहा कि ईरान समझौते के लिए तैयार (ready) है, ताकि किसी सैन्य कार्रवाई (military action) से बचा जा सके।
हालांकि, ट्रंप ने स्पष्ट किया कि अगर समझौता (deal) नहीं हुआ तो आगे क्या कदम उठाए जाएंगे, यह देखा जाएगा। डेडलाइन (deadline) को लेकर सवाल पर उन्होंने कहा, “यह बात ईरान अच्छी तरह समझता है।”
ईरान का रुख (Iran’s stance)
तुर्की (Turkey) दौरे पर गए ईरान के विदेश मंत्री (Foreign Minister) अब्बास अराघची (Abbas Araghchi) ने साफ किया कि ईरान का मिसाइल प्रोग्राम (missile program) किसी भी बातचीत (negotiation) का हिस्सा नहीं बनेगा। उनका कहना था कि कोई भी देश अपनी सुरक्षा (security) और आत्मरक्षा (self-defense) के अधिकार पर समझौता नहीं करता। ईरान के लिए बैलिस्टिक मिसाइल सिस्टम (ballistic missile system) उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा (national security) की रेड लाइन (red line) है।
अराघची ने यह भी कहा कि जब तक अमेरिका (USA) यह भरोसा (assurance) नहीं देता कि बातचीत के दौरान ईरान पर कोई सैन्य कार्रवाई (military action) नहीं होगी, तब तक वार्ता (talks) संभव नहीं है। अली खामेनेई (Ali Khamenei) ने भी बार-बार कहा है कि अमेरिका पर भरोसा (trust) नहीं किया जा सकता और परमाणु समझौते (nuclear deal) पर बातचीत (talks) करना बेमतलब है।
अमेरिका-इजरायल (USA-Israel) का प्लान
अमेरिका और इजरायल (Israel) चाहते हैं कि नया परमाणु समझौता (deal) सिर्फ यूरेनियम संवर्धन (uranium enrichment) तक सीमित न रहे, बल्कि ईरान के मिसाइल प्रोग्राम (missile program) को भी खत्म (eliminate) किया जाए। ट्रंप प्रशासन (Trump administration) एक “कम्प्रीहेंसिव डील (comprehensive deal)” की बात कर रहा है, जिसमें परमाणु कार्यक्रम (nuclear program), मिसाइल क्षमता (missile capability) और क्षेत्रीय सहयोगियों (regional allies) से ईरान के रिश्ते शामिल हैं।
इजरायल (Israel) ने कहा है कि वह ऐसे किसी समझौते (deal) को स्वीकार नहीं करेगा, जिसमें ईरान को मिसाइल बनाने की इजाजत (permission) मिले। इजरायल लीबिया मॉडल (Libya model) का उदाहरण देता रहा है, यानी पूरी तरह हथियार (weapons) का खात्मा। जून 2025 में इजरायल ने इसी लक्ष्य (target) के तहत ईरान पर हमले (attacks) भी किए थे।
अमेरिकी संसद (US Congress) के कई नेताओं ने भी इजरायल के रुख (stance) का समर्थन किया। रिपब्लिकन (Republican) सीनेटर लिंडसे ग्राहम (Lindsey Graham) और टॉम कॉटन (Tom Cotton) ने कहा कि कोई टिकाऊ समझौता (sustainable deal) तभी संभव है, जब ईरान अपने यूरेनियम संवर्धन (uranium enrichment) और मिसाइल गतिविधियों (missile activities) को पूरी तरह रोक दे।
अमेरिका की रणनीति (USA strategy)
अमेरिका लगातार आर्थिक दबाव (economic pressure) भी बढ़ा रहा है। ट्रंप प्रशासन की “मैक्सिमम प्रेशर (maximum pressure)” नीति के तहत ईरान पर लगे प्रतिबंध (sanctions) न सिर्फ जारी हैं बल्कि और सख्त (strict) किए गए हैं। खासकर उन संस्थाओं (organizations) और देशों (countries) पर सेकेंडरी सैंक्शंस (secondary sanctions) लगाए गए हैं, जो ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम (ballistic missile program) को समर्थन (support) देते हैं।
अमेरिका (USA) का मकसद (goal) साफ है: आर्थिक (economic) और सैन्य (military) दबाव के जरिए ईरान (Iran) को ऐसी रियायतें (concessions) देने के लिए मजबूर (force) करना, जिससे उसका परमाणु (nuclear) और मिसाइल ढांचा (missile structure) कमजोर (weaken) हो जाए। ईरान (Iran) इसे परमाणु समझौते (nuclear deal) की आड़ (pretext) में अपनी कमजोरी (weakening) मानता है।
ईरान (Iran) ने स्पष्ट किया है कि वह परमाणु कार्यक्रम (nuclear program) में सीमित लचीलापन (limited flexibility) दिखा सकता है, लेकिन मिसाइल सिस्टम (missile system) को खत्म करना उसके लिए आत्मसमर्पण (surrender) जैसा होगा। इसलिए अमेरिका-इजरायल (USA-Israel) की रणनीति को ईरान पहले ही समझ चुका है और फिलहाल पीछे हटने (retreat) के मूड में नहीं है।
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