झारखंड में खनन क्षेत्र में बच्चों से नारेबाजी कराने का आरोप, सुरक्षा और कानून-व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल
झारखंड के चट्टी बरियातू कोयला खनन परियोजना क्षेत्र में स्कूली बच्चों को सक्रिय खनन क्षेत्र में ले जाकर नारेबाजी कराने का मामला सामने आने के बाद राज्य की सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक कार्रवाई पर गंभीर प्रश्न खड़े हो गए हैं।
10 फरवरी 2026 को लगभग 100 से अधिक स्कूली बच्चों को प्रतिबंधित एवं उच्च जोखिम वाले खनन क्षेत्र में ले जाया गया। आरोप है कि पूर्व विधायक योगेंद्र साव के नेतृत्व में बच्चों को खनन स्थल तक पहुंचाया गया, जिससे उनके जीवन को गंभीर खतरा उत्पन्न हुआ। इससे एक दिन पहले 9 फरवरी को भी इसी क्षेत्र में करीब 60 से 70 स्कूली बच्चों को ले जाकर नारेबाजी कराई गई थी। यह घटना अपराह्न लगभग 3:30 बजे हुई।
इसी दिन सुबह करीब 9 बजे लगभग 20 महिलाओं के एक समूह ने कोल हैंडलिंग प्लांट (सीएचपी) जंक्शन और अन्य परिचालन क्षेत्रों में प्रवेश कर कोयला परिवहन को भौतिक रूप से अवरुद्ध कर दिया, जिससे खनन कार्य ठप हो गया।
विशेषज्ञों के अनुसार कोयला खनन क्षेत्र अत्यंत संवेदनशील और खतरनाक होते हैं। इन क्षेत्रों में भारी मशीनरी, डंपर, कन्वेयर सिस्टम, विस्फोटक कार्य और अस्थिर भूमि जैसी परिस्थितियां मौजूद रहती हैं। बिना सुरक्षा व्यवस्था के इन क्षेत्रों में आम नागरिकों, विशेषकर बच्चों का प्रवेश गंभीर दुर्घटना को आमंत्रण देने जैसा है।
सक्रिय खनन क्षेत्र में बच्चों से नारेबाजी कराना न केवल गैर-जिम्मेदाराना कृत्य माना जा रहा है, बल्कि इसे जानबूझकर खनन कार्य में बाधा उत्पन्न करने की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है। आरोप है कि बच्चों को एक तरह से “मानव ढाल” के रूप में इस्तेमाल किया गया, जिससे प्रशासन कार्रवाई करने से हिचके।
बताया गया है कि ग्राम प्रतिनिधियों से वार्ता के बाद 6 और 7 फरवरी को खनन कार्य दोबारा शुरू हुआ था, लेकिन पूर्व विधायक और उनके समर्थकों के हस्तक्षेप के कारण दोनों ही दिनों में काम को फिर से बंद करवा दिया गया। एनटीपीसी माइनिंग लिमिटेड (एनएमएल) और माइन डेवलपर एवं ऑपरेटर कंपनी के कर्मचारियों को धमकियां दिए जाने की भी सूचना है, जिससे श्रमिकों में भय का माहौल बन गया है।
लगातार हो रहे अवरोधों का सीधा असर करनपुरा सुपर ताप विद्युत स्टेशन को कोयला आपूर्ति पर पड़ा है। कोयले की कमी के कारण राज्य में विद्युत उत्पादन प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है। वहीं परिवहन बाधित होने से खनित कोयला खुले भंडारण स्थलों पर जमा हो रहा है, जिससे कोयला आग लगने का खतरा भी बढ़ गया है। यह स्थिति पर्यावरण और सुरक्षा दोनों के लिहाज से गंभीर मानी जा रही है।
इन घटनाओं से राज्य और देश को राजस्व हानि हो रही है तथा संभावित विद्युत संकट से सार्वजनिक सेवाएं भी प्रभावित हो सकती हैं। इसके बावजूद राजनीतिक हितों के लिए बच्चों की सुरक्षा को नजरअंदाज किए जाने के आरोप लगाए जा रहे हैं।
स्थानीय प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। पूर्व में हुई घटनाओं के बावजूद प्रभावी निवारक कार्रवाई नहीं किए जाने से स्थिति और गंभीर हो गई है। अब मामला उस स्तर तक पहुंच गया है, जहां बच्चों के जीवन को भी खतरे में डाला जा रहा है।
जानकारों का कहना है कि किसी भी राजनीतिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए मासूम बच्चों को खतरनाक खनन क्षेत्रों में ले जाना न केवल अमानवीय है, बल्कि कानून और नैतिकता दोनों के खिलाफ है। इस पूरे प्रकरण ने झारखंड में सुरक्षा, प्रशासनिक सख्ती और जिम्मेदार राजनीति की आवश्यकता को एक बार फिर उजागर कर दिया है।
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